दास्तां-ए-गोवा

क्या आप जानते हैं कि गोवा पुर्तगाल से बहुत बाद में आज़ाद हुआ, और जाते-जाते पुर्तगाली वहाँ के तटों पर लैन्ड माइन बिछा गए? आप अपनी पत्नी का पर्स और सैंडल हाथ में लेकर बीच पर घूम रहे हैं, आपकी नजर विदेश से आये कुदरत के एक खूबसूरत टुकड़े पर पड़ी और बूम! आप तुरंत शारीरिक अंगों की तुलना में करीना कपूर के साहबज़ादे के नामरूपी शासक के समकक्ष खड़े होंगे। क्योंकि भारत सरकार ने आपको आधार कार्ड देते समय मनुष्य माना है, तो आपको इतनी तो अनुमति है कि आप चलते समय गर्दन स्वाभाविक रूप से पाँच-दस डिग्री इधर उधर घुमा सकें, पर नज़रों का क्षण भर ठहरना जानलेवा हो सकता है। स्कैन करना है, नाच-गा के बलाएं नहीं लेनी।

मैंने एक विवाहित पुरुष के दर्द को अपने ए-पॉज़िटिव खून से लिखे इस शेर में बयान करने की कोशिश की है-
“गला घोंटो तमन्ना का कि सर उठाओगे एक दिन,
पुतलियों की हरकतों पर हुक्मरां की बंदिशें हैं।“

इंजीनियरिंग तो हमने बीस रुपए की थाली खा कर गुजारी। और नौकरी में जब तक दो-ढाई रुपए जुड़े और होश आया तो देखा पंडित जी तीसरे-चौथे वचन पर धोती पकड़ कर हाँ बुलवा रहे थे। फिर जब मुंबई में रहते दो साल हो गए और ताने सुनकर कानों से इतना खून बहने लगा कि आस पास चलने वाले लोग फिसलने लगे, तो हमने मुंबई नगरपालिका के रजिस्ट्री आदेश पर गोवा की ट्रेन पकड़ ही ली।

गोवा का पब्लिक ट्रांसपोर्ट पश्चिम बंगाल के पंचायती चुनावों जितना अच्छा है। रेलवे स्टेशन के बाहर पुष्पक विमान सरीखी डग्गामार बसों में एक दूसरे की बगलों में मुहँ दबाए लोग एक दूसरे के साथ शारीरिक द्रव्यों की अदलाबदली कर “सबका DNA एक है” वाली RSS की थ्योरी को पुख्ता करने में योगदान देते हैं। क्योंकि कंधों और घुटनों से भरी वह बस जल्दी ही एक जिस्म सौ जान में तब्दील हो जाती है, तो लोग पड़ोसी की विनती पर उसकी जेब से पर्स टटोल कर सर्कस के करतब दिखाते गुस्सैल कंडक्टर को भुगतान करते हैं। उस बस में चढ़ने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उस से उतर कर आपको बहुत अच्छा लगता है। बस ने हमें अंजुना बीच के पास एक चौराहे पर उतारा, जहाँ से होटल जाने के लिए ऑटो वाले ने मुझसे मेरे गाँव की जमीन अपने नाम करा ली।

जब हम होटल के रिसेप्शन पर पहुंचे तो देखा स्टाफ का एक कर्मचारी होटल के मैनेजर का कॉलर पकड़ के खड़ा है। हमें देख कर वह दोनों ऐसे सकपका गए जैसे हमने उन्हें प्रेमालाप की अवस्था में देख लिया हो। हमारी तरफ वह दोनों आदतवश मुसकुराये पर स्टाफ का लड़का, जिसका शायद उस होटल में वह आखिरी दिन था, कॉलर छोड़ना भूल गया। कुछ क्षण के बाद उसे कुछ याद आया, उसने मैनेजर को देख कर, दांत पीस कर फुसफुसाते हुए संस्कृत में कोई श्लोक पढ़ा और अपना बैज वहीं मेज पर पटक कर चला गया। मैनेजर साहब ने झेंप कर स्थिति संभाली और हमें हमारी कमरे की चाबी दी। मैंने आह भरी कि काश इस अंदाज में नौकरी छोड़ने की हिम्मत कभी मैं भी जुटा सकता। पर मुझ निर्लज्ज को तो जाम्बवंत भी जोश नहीं दिला सकता।

होटल में एक स्विमिंग पूल था, जिसमें तैरने के लिए आपको या तो किसी और के जिस्म से लिपटा कच्छा किराये पर लेना होगा या फिर तकरीबन पचपन हजार पाँच सौ पंद्रह रुपए देकर स्विमिंग सूट खरीदना होगा। होटेल्स के इस घोटाले की जांच कौन लोकपाल कर रहा है? पर भाई, उस होटल का खाना! ज़िंदगी में ऐसी दाल मक्खनी और ऐसा कढ़ाई पनीर नहीं खाया। भगवान उस होटल के शेफ के बीवी के इंस्टाग्राम अकाउंट की रीच बढ़ाए। उस होटल से अंजुना बीच वॉकिंग डिस्टन्स पर था। मेरे लिए कोई भी जगह जो दो किलोमीटर के अंदर है, वॉकिंग डिस्टन्स पर है। मेरी पत्नी मेरी जिन बाईस हरकतों से सबसे ज्यादा नफरत करती है, यह उनमें से टॉप फाइव में है। हम होटल से बाहर निकले तो देखा एक विदेशी नवयुवती लकड़ी की एक सीढ़ी पर खड़े होकर एक होटल की दीवार पेन्ट कर रही है। सीढ़ी के थोड़ा पास एक सड़क चलता हुआ लड़का मुहँ खोल कर किसी चमत्कार के इंतज़ार में खड़ा था। वह राजस्थान टूरिज्म के “जाने क्या दिख जाए” कैम्पैन से काफी प्रभावित लग रहा था।

अंजुना बीच काफी सुंदर था। बड़ा सा समुद्र मेरे पैर छूने को हिलोरे मार रहा था। कुछ लोकल गाँव वाली औरतें हमें शाम को गुड मॉर्निंग बोल कर सीप से बने हार बेचने की फिराक में थी। मैंने मना किया तो उन्होंने कहा कि वह मुझ से नहीं मेरी पत्नी से बात कर रही है। मैं इंतज़ार करता रहा कि मेरी पत्नी इस भीषण बेइज्जती में मेरा साथ देगी, पर नहीं। वह उनके साथ हँसती मुस्कराती रही और वह हार खरीद कर, गले में डाल कर इतराते हुए आगे चल पड़ी। मेरे पास एक अपमानित जानवर की भांति खुर घसीटते, फनफनाते हुए उसके पीछे चलने के अलावा कोई चारा नहीं था। बीच पर हमने एक होटल की लेटने वाली बेंच ली और उस पर पसर कर सामने जल-क्रीडा करते हुए कुछ अधेड़ उम्र के लोगों के छाती के बाल गिनते हुए शाम बिता दी।

देखिए, गोवा में थोड़ा सेटअप तो है। अच्छा बीच है, उसके पास कुछ अच्छे कैफे हैं। साफ रेत और पानी है। पर वहाँ जा कर दर्जन भर बीच पर तीर बिंधा दिल रेत पर उकेरने का प्रोग्राम ना बनाएं। दो तीन बीच देख लिए तो सब देख लिए। गोवा में स्कूटी किराये पर मिलती हैं, जो वहाँ पर्यटकों के ट्रांसपोर्ट के लिए एकमात्र अच्छा विकल्प है। हालांकि मेरे इस कन्फेशन पर फेसबुक पर काफी चूड़ियाँ टूटेंगी, पर सच यह है कि मुझे बाइक, स्कूटी, ऐक्टिवा कुछ चलाना नहीं आता। इस उम्र में भी मैं रिक्शा पकड़ने के लिए बेशर्मों की तरह हाथ हिला कर खड़ा हो जाता हूँ। इसलिए स्कूटी हमने ली नहीं और दो किलोमीटर के लिए सात सौ रुपए देने के लिए हमारे मिडिल क्लास ज़मीर ने गवाही नहीं दी। तो हफ्ते भर का प्रोग्राम होने के बावजूद हमारी गतिविधि काफी सीमित रही।

सड़क पर चलने वालों के लिए शाम ढले गोवा मुझे इतना सुरक्षित नहीं लगा। अंधेरी सी गलियों में सुगबुगाहट से करते कुछ रंग-बिरंगे लड़के हमें काकोरी में ट्रेन लूटने की साजिश सी करते दिखे। अंजुना बीच के पास पर्पल मार्टीनी करके एक कैफै है, जिसकी लोकेशन बड़ी उत्तम है, वहाँ बैठ कर एक कोल्ड कॉफी के साथ सूर्यास्त देखने में बड़ा सुकून मिलेगा। नाश्ते के लिए Baba Au Rahm कैफै ट्राइ कर सकते हैं, वहाँ वेज बर्गर और वियतनामीज़ कॉफी बड़ी अच्छी मिलती है। बाकी वहाँ अतरंगी पार्टियां होती रहती है, जिनमें नशे में धुत्त लोग अपने जिस्म को त्रिकोणमिति में व्याखित हर कोण पर मोड़ने की कोशिश करते हैं। मुझे ऐसे भीड़-भाड़ के क्लब और पार्टी पसंद नहीं तो मैं गया नहीं। बाकी जिस आदमी के पास ऑटो के पैसे नहीं वह कैसीनो और क्रूज पर तो क्या जाएगा? एक दिन शायद इस संस्कारी ट्रिप के लिए गोवा मुझे माफ कर देगा…
-गौरी शंकर