मुंशियारी की एक शाम-एक भूत से मुकालात

मुझे उस डूबती शाम मे कुछ ज्यादा दिखाई नहीं दे रहा था, पर मुझे इतना पता था कि मै अकेला नहीं हूँ। नहीं, बात पीछे कदमों की आवाज की नहीं, ना ही टहनियों और पत्तों की सरसराहट की। मेरी गर्दन के पीछे एक अजीब सी सनसनाहट थी। मेरे रोंगटे खड़े हुए थे। और मै जानता था कि मेरे पीछे कोई भालू या तेंदुआ नहीं है। कोई आदमी भी नहीं है। यह कुछ ऐसा है, जिसे मैंने केवल सोचा और पढ़ा है, महसूस नहीं किया। कुछ ऐसा जो बेचैन है, कोई ऐसा जो परेशान है।

पिछले 3 घंटों से मै मुंशियारी के इन पहाड़ों मे भटक रहा हूँ। अकेला। October मे यहाँ कोई घूमने नहीं आता। बस यह सोता हुआ सा कस्बा और इसमे भटकता हुआ मैं। ऐसा नहीं कि पिछले 3 घंटों मे मुझे कोई मिला नहीं। 2 घंटे पहले एक गड़रिया अपने 20-25 भेड़ों और 2 खतरनाक कुत्तों के साथ दिखा था । मै उस से 100-200 फीट ऊपर था, मैंने उस सड़क का रास्ता पूछा, उसने एक तरफ इशारा किया। मैंने उस से कहा की मुझे नीचे तक पहुंचा दो, मै 200-500 रुपए देने को भी तैयार था। पर वो नहीं माना। और मै उस से बात कर ही रहा था कि उसके कुत्ते भोंकते हुए उस पहाड़ी चढ़ने लगे जिस पर मै खड़ा था। अगर मै वहाँ से नहीं हिलता, तो अगले 2 मिनट मे वह कुत्ते ऊपर आ जाते, और फिर गड़रिया नीचे से कितना भी चिल्लाता, वो नहीं मानते। मुझे उस समय भटके हुए एक घंटा ही हुआ था। मै इतना थका और टूटा नहीं था, कि मै उस अनजान आदमी के सामने रोता और गिड़गिड़ाता। मै उसके हाथ के इशारे से बताई दिशा मे चल पड़ा।

अब शाम के 6 बज चुके थे, सूरज डूबे आधा घंटा हो चुका था, और मै जंगल मे पूरी तरह से भटक चुका था। उस जंगल मे जहां जानवरों की कमी नहीं थी और बस अब कुछ ही देर मे वह सब शिकार की तलाश मे निकालने वाले थे। जाने उनमे से कितनों को मेरी गंध आ चुकी होगी। मेरी फोन की बैटरी मर चुकी थी, और अब शायद मेरा नंबर था। एक अनजान चीज का डर सबसे खतरनाक होता है। कब, किसी झाड़ी से कोई जानवर निकले और मेरी गर्दन पकड़ ले। मुझे जिंदा नोच नोच कर खाए। मेरी चीख पुकार का आनंद ले। यह डर, कि अगला कोई भी क्षण, अगला कोई भी कदम, आखिरी हो सकता है, बड़ा भयावह है। मेरे पैर थक कर जवाब दे चुके थे। मै पागलों की तरह, चारों तरफ आंखे फाड़ कर बुझती हुई रोशनी मे देखने की कोशिश कर रहा था। दूर कहीं एक कार जा रही थी। मै उसकी आवाज सुन सकता था। पर उस कार, उस सड़क तक पहुँचने का रास्ता मै नहीं जानता था।

तभी मुझे एहसास हुआ कि मेरे पीछे कोई है। मै पलटा नहीं। मेरा खून जम सा गया था। मुझे लगा अगर मै पलटूँगा तो मेरा डर, मेरा अनुमान, सच्चाई मे बदल जाएगा। मैंने आगे कदम बढ़ाए। तब मैंने अपने कंधे पर एक हाथ महसूस किया। मेरी रीढ़ की हड्डी मे एक कंपकपी सी दौड़ गई। एक उंगली ने मेरी गर्दन को हल्के से सहलाया। मैंने पीछे मुड़ कर देखा और वहाँ कोई नहीं था। क्या यह सब मेरी कल्पना थी? मै यह सोच ही रहा था कि मुझे किसी के सुबकने की आवाज सुनाई दी। कोई औरत मुझसे बस 10-20 फीट की दूरी पर रो रही थी। पर वहाँ कोई दिख नहीं रहा था। अब तक मुझे यह एहसास हो चुका था कि यह कोई भूत है। मैंने चारों तरफ नजर घुमाई। भागने के लिए सारे रास्ते खुले थे। पर भाग कर जाऊंगा कहाँ? हर तरफ एक जैसे पेड़ पौधे, एक जैसी चट्टानें और पहाड़ियाँ। फिर भी मैं घबराहट मे आगे भागा पर किसी पत्थर से ठोकर खाकर गिर पड़ा और फिर उठ नहीं सका। क्योंकि मेरी पीठ पर कोई बैठा था। दोनों पैर मेरी कमर के इधर उधर और मजबूती से मेरे बाल पकड़े हुए। मै उसको अब भी नहीं देख पा रहा था। बस एक वजन और तनाव था जो मुझे मेरी आती हुई मौत से भी ज्यादा डरा रहा था। तभी मुझे मेरे दायें कान पर उसकी गर्म सांस महसूस हुई। वो कुछ फुसफुसा रही थी। मुझे बहुत धीमी पर भारी आवाज मे सुनाई दिया, “क्यों रे। तुझे कोई चालीसा, पचासीया नहीं आती क्या?” मेरी गर्दन पर उसने अपनी जीभ फिराई और जोर जोर से हंसी। मेरे सर के बाल अब भी उसके गिरफ्त मे थे। और उसके हिलने की वजह से बहुत दर्द कर रहे थे। मै दर्द से कराहते हुए चिल्लाया, “ तुम कौन हो?”

“तेरी मौसी” उसने कहा और फिर से अपनी डरावनी हंसी मे हंस दी। फिर मेरे गालों पर उसने अपने नुकीले नाखून गड़ाए और कानों तक गहरा खरोंच दिया। खून की बूंदे मुझे घास पर गिरती हुई दिख रही थी। मै चिल्ला उठा। उस दर्द से बिलबिलाते हुए मैंने हिम्मत की और अपने हाथों और पैरों से जोर लगा कर उठ खड़ा हुआ। मेरी पीठ पर सवार वो भूतनी शायद दाईं तरफ गिर पड़ी। इस से मुझे साहस मिला। वो ताकतवर है, पर उसे भी गिराया जा सकता है। मुंशियारी के इन जंगलों मे मै अपनी ज़िंदगी की आखिरी लड़ाई लड़ रहा था। और यह लड़ाई मै पूरी तबीयत से लड़ने वाला था। मेरे गालों से खून धीरे धीरे मेरी शर्ट के अंदर और फिर छाती पर बह रहा था। जोश मे मेरे शरीर की एक एक नस फड़क रही थी। अरे साला मरना तो है ही, मरने से पहले इस मौत के गाल पर एक तमाचा तो मारा जाए। मेरे सामने कोई ऐसा था जो मुझे मारना चाहता था, और मेरा शरीर जिंदा रहने के लिए लड़ रहा था। अब वो कोई जानवर हो, आदमी हो, या भूत। मै लड़ूँगा। मै अपने मुक्के हवा मे लहराता हुआ तेजी से उस तरफ लपका जिधर मुझे लगा कि वो भूतनी गिरी थी। और वाकई मेरे हाथ जैसे किसी रबड़ के पुतले से टकराए। अगले 20-25 सेकंड ना मेरे हाथ रुके ना पैर। मेरे शरीर की एक एक कोशिका की आखिरी शक्ति का इस्तेमाल करके मैंने मुक्के और लातें उस अद्रश्य शरीर पर बरसाए। मै जोर जोर से चिल्ला रहा था। शायद उस जंगल मे भटकते भटकते मेरे अंदर का जानवर बाहर आ गया था।

मुझे उस भूत की दर्द की कराह सुनाई दे रही थी। वो शायद अब नीचे गिर चुकी थी। मैं उसे लातें मार रहा था। बिना रुके। फिर मैंने उसे घास पर घिसटते हुए महसूस किया। वो दूर जा रही थी। मैं नीचे झुका और टटोटलते हुए उसे पकड़ने की कोशिश की। उसने मेरे हाथों पर नाखून गड़ाए। मैंने उसे फिर घुटनों, हाथों और लातों से मारा। मै हाथ पैर चलाते हुए थक गया था। मैं हाँफने के लिए एक सेकंड रुक और बस। अब वो वहाँ नहीं थी। मैंने उसको कभी नहीं देखा। पर मुझे पता था कि अब वह मेरे आस पास नहीं थी। क्या वो वाकई चली गई थी? या फिर वहीं किसी पेड़ के पीछे छुपकर सुस्ता रही थी और अगले 5 मिनट के बाद फिर से मुझे पर झपटेगी। मुझे नहीं पता था। मैंने ऊपर आसमान की तरफ देखा। रोशनी अपनी आखिरी साँसे गिन रही थी पर अंधेरा लड़ाई अब भी जीता नहीं था। उम्मीद अभी भी बाकी थी। मैंने ध्यान से सुना, फिर कोई कार दूर सड़क पर जा रही थी। मैंने उस आवाज की दिशा मे दौड़ लगा दी। मेरे कदमों मे उस समय मानों खरगोश की ताकत थी। मै पहाड़ियाँ उतरता चढ़ता चला गया। पर मैंने अपनी दिशा नहीं बदली। ऐसे ही बदहवास 45 मिनट दौड़ने के बाद मुझे अपनी दाईं तरफ एक घर की रोशनी दिखाई दी।

चट्टानों पर फिसलते, गिरते पड़ते, टहनियों के सहारे एक दीवार को फांद कर अंततः मै उस घर के दरवाजे पर पहुंचा और दरवाजा खटखटा कर गिर पड़ा। 10 मिनट बाद मेरी आँख खुली तो पता चला वो किसी किसान का घर था। पानी पी कर थोड़ी हिम्मत आई। उस किसान की बीवी ने मुझे एक गीला कपड़ा दिया, जिस से मैंने अपने चेहरे से खून साफ किया। मैंने उन्हे बताया कि मै दोपहर मे अकेले ही पहाड़ियों मे घूमने निकला था और रास्ता भटक गया था। उसके लड़के ने मुझे बाइक पर बिठा कर मेरे होटल छोड़ दिया। मै इतना थका हुआ था, कि नहा कर खाने खाते ही सो गया। मेरी आँख मेरे कमरे के दरवाजे पर दस्तक से खुली। मैंने अचकचाते हुए टेबल लैम्प ऑन किया। मोबाईल मे टाइम देखा रात के 2.30 बज रहे थे। मुझे डर की सिरहन हुई। मैं धीरे से दरवाजे के पास जाकर पूछा, क…कौन है? आवाज सुनी हुई थी। दबी हुई हंसी मे सुनाई दिया, “तेरी मौसी” …